अनवर चौहान
लड़-झगड़ कर अलग होना, फिर कुछ समय बाद मिलना-एक होना और आखिर फिर टूट कर बिखरना, भारतीय राजनीति में  समाजवादियों की यह फितरत बन गई है। किसी के लिए भी ठीक-ठीक बता पाना मुमकिन नहीं है। शानदार वैचारिक विरासत वाली ये सियासी जमात कितनी बार टूटी और जुड़ी बता पाना नामुमकिन जैसा ही हैं. बहरहाल, इतिहास खुद को फिर से दोहरा रहा है. लगभग बीस सालों तक जनता दल (यू) की छतरी तले हमकदम रहे शरद  यादव और नीतीश कुमार की राहें अब पूरी तरह जुदा हो गई हैं.


उनकी पार्टी के दो फाड़ होने और एक दूसरे को निकालने की औपचारिकताएं ही अब शेष रह गई हैं. नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस के साथ बीस महीने पुराने अपने महागठबंधन से  नाता तोड़कर अपना राजनीतिक भविष्य भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नत्थी कर लिया है.उनके इस फैसले को उनकी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और संसदीय दल के नेता शरद यादव ने मानने से साफ इनकार कर दिया है.हालांकि, नीतीश कुमार और भाजपा की ओर से शरद यादव को मनाने की पूरी कोशिश की गई थी. उन्हें महत्वपूर्ण महकमे के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का संयोजक बनाने की पेशकश भी की गई थी. खुद नीतीश कुमार के अलावा केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने शरद को मनाने की कोशिश की थी. लेकिन उनकी कोशिश नाकाम रही.शरद अब नीतीश के फैसले को बिहार की जनता से विश्वासघात और वादाखिलाफी करार देते हुए `जनता से संवाद` के नाम पर बिहार की सड़कों पर निकल पड़े हैं.

शरद के इस कदम को नीतीश के नेतृत्व के खिलाफ उनकी बगावत माना जा रहा है. इसीलिए नीतीश की ओर पार्टी महासचिव केसी  त्यागी के जरिये उन्हें अनुशासन में रहने की हिदायत दिलाकर और उनके समर्थक माने जाने वाले पार्टी महासचिव अरुण श्रीवास्तव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाकर सख्त संदेश भी दिया गया है. चूंकि इस हिदायत और संदेश को अनसुना कर शरद यादव बिहार में अपना दौरा और नीतीश के फैसले की मुखालफत जारी रखे हुए हैं, इसलिए जल्द ही उन पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई का डंडा चल सकता है. संकेत हैं कि उन्हें संसदीय दल के नेता पद से हटाकर पार्टी से निलंबित किया जा सकता है.

अपने खिलाफ नीतीश की ओर से होने वाली इस संभावित कार्रवाई का अंदाजा शरद को भी है, इसीलिए वे भी अपने दौरे में हर जगह कह रहे हैं कि कुछ लोग सत्ता की खातिर महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ चले गए हैं लेकिन बिहार में जद (यू), राजद और कांग्रेस का महागठबंधन अभी भी कायम है और आगे भी कायम रहेगा.